Indore Property Fraud: कॉलोनाइजर अदालत में फंसा तो ईओडब्ल्यू के दरवाजे पहुंचा 

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Indore Property Fraud: भूमाफिया ने पांच हेक्टेयर से अधिक की विवादित जमीन दो कारोबारियों को अलग—अलग तारीखों में 23 करोड़ बेची, पहली बार जमीन खरीदने वाले व्यक्ति ने कोर्ट में दाखिल की थी याचिका, जिसके बाद दूसरा पक्ष उसमें पार्टी बना तो हुआ यह वाला खेल…

Indore Property Fraud
सांकेतिक ग्राफिक डिजाइन टीसीआई

इंदौर/भोपाल। भूमाफिया ने पांच हेक्टेयर से अधिक की एक जमीन में फर्जीवाड़ा कर दिया। उसने एक ही जमीन का सौदा अलग—अलग व्यक्तियों से अलग—अलग तारीखों में किया। यह घटना मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर (Indore Property Fraud) जिले की है। जिसके बाद पहले सौदा करने वाले कारोबारी ने जमीन बेचने वाले भूमाफिया समेत दूसरी पार्टी जिसने दाम से ज्यादा भाव लगाकर उसे खरीदा उसको अदालत में पार्टी बना दिया। वहीं उस जमीन पर जारी टीएंडसीपी को भी निरस्त कराया गया। जिसके बाद दूसरी पार्टी ने आर्थिक प्रकोष्ठ विंग में जाकर इसी साल आवेदन दिया। हैरानी वाली बात यह है कि कई घोटालों में सालों लंबित फाइल रखकर जांच करने वाली ईओडब्ल्यू ने छह महीने में जांच करके प्रकरण दर्ज कर लिया। जबकि सभी पक्षकार अदालत में पहले से मौजूद हैं।

कंपनी में यह थे पार्टनर जिन्होंने जमीन बेची

ईओडब्ल्यू (EOW) के अनुसार इस मामले में जनवरी, 2023 में शिकायत रतन सिंह शेखावत (Ratan Singh Shekhawat) पिता सज्जन सिंह शेखावत ने दर्ज कराई थी। वे इंदौर (Indore) स्थित भंवरासला में रहते हैं। रतन सिंह शेखावत मैसर्स गोल्ड कंपनी (M/S Gold Company) में जॉब करते हैं। यह कंपनी ओम गुरूदेव काम्प्लेक्स (Om Gurudev Complex) स्कीम नंबर—54 निवासी विकास गुलाटी (Vikas Gulati) पिता स्वर्गीय ओम प्रकाश गुलाटी की है। मैसर्स गोल्ड कंपनी ने पांच हेक्टेयर से अधिक जमीन खरीदने के लिए तीन एग्रीमेंट जनवरी, 2013 से मार्च, 2013 के बीच किए थे। जमीन की उस वक्त कीमत विकास गुलाटी ने 14 करोड़ 37 लाख रूपए लगाई थी। यह जमीन खरीदने का सौंदा मैसर्स गोल्ड कंपनी ने मैसर्स गोल्ड टैरेस अपार्टमेंट से किया था। जिसमें इंदौर के कनाडिया स्थित गुलमर्ग प्राइड एंड वैली निवासी महावीर जैन (Mahaveer Jain) पिता हुकुम चंद्र जैन, इंदौर स्थित अंकिता एनेक्स चिकित्सक नगर निवासी अनिल कुमार सोगानी (Anil Kumar Sogani) पिता बसंती लाल सोगानी और इंदौर स्थित सिद्धार्थ नगर निवासी राहुल कासलीवाल (Rahul Kasliwal) पिता सुरेंद्र कासलीवाल पार्टनर थे। जमीन भूमाफिया इंदौर स्थित पालीवाल नगर (Paliwal Nagar)  निवासी रितेश उर्फ चंपू अजमेरा (Ritesh@Champu Ajmera) पिता पवन अजमेरा की मदद से खरीदी गई थी।

डील टूटने पर देना थे पंद्रह करोड़ रूपए

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सांकेतिक चित्र

खरीदी गई जमीन पर विकास गुलाटी कनक रेसीडेंसी बनाने (Kanak Residency) जा रहे थे। जिसके लिए टीएंडसीपी से अनुमति भी नवंबर, 2018 में ली गई। जब यह कवायद की गई तो मैसर्स इंस्टीट्यूट इंफ्रा कंस्ट्रक्शन प्रायवेट लिमिटेड (M/S Institute Infra Private Limited) सामने आ गई। उसने विकास गुलाटी की फर्म से हुई खरीदी को चुनौती देते हुए उसको भी अदालत में दाखिल परिवाद में पार्टी बना दिया। इस विवाद (Indore Property Fraud) के चलते टीएंडसीपी ने जुलाई, 2022 में कनक रेसीडेंसी को जारी सारी अनुमतियों को निरस्त कर दिया। जबकि कॉलोनाइजर तब तक 46 ग्राहकों को भूखंड बेचने का करार कर चुका था। ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया है कि मामले में आरोपी महावीर जैन, अनिल कुमार सोगानी, राहुल कासलीवाल और रितेश उर्फ चंपू अजमेरा ने उक्त जमीन का सौदा मैसर्स इंस्टीट्यूट इंफ्रा कंस्ट्रक्शन प्रायवेट लिमिटेड के साथ अगस्त, 2012 में ही कर लिया था। इसके बदले में आरोपियों ने कंपनी से नौ करोड़ रूपए भी ले लिए थे। लेकिन, आरोपियों ने पूर्व में किया करार तोड़ दिया। ऐसा करने पर आरोपियों को सबसे पहले जमीन खरीदने वाली फर्म को 15 करोड़ रूपए चुकाना थे। इसमें से आरोपियों की कंपनी ने चार करोड़ रूपए चुका भी दिए थे।

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पूरे मामले में इस कारण है तकनीकी पेंच

यह पूरा मामला न्यायालय के संज्ञान में हैं। इसके बावजूद ईओडब्ल्यू ने 40/23 धारा 409/420/34/120—बी (गबन, जालसाजी, एक से अधिक आरोपी और साजिश के तहत प्रकरण) दर्ज किया है। जमीन खरीदने वाली फर्म के संचालक विकास गुलाटी अदालत में दायर परिवाद में घिरे हुए हैं। अब उन्होंने अपने कर्मचारी को आगे करके भूमाफिया चंपू अजमेरा समेत मैसर्स गोल्ड  अपार्टमेंट (M/S Gold Terrace) के तीनों पार्टनरों के खिलाफ आवेदन देकर मुकदमा दर्ज करा दिया। वहीं ईओडब्ल्यू ने इस पूरे फर्जीवाड़े में टीएंडसीपी की भूमिका की जांच ही नहीं की। जबकि यह मामला कॉलोनी काटने की दी गई परमिशन के बाद ही अदालत में पहुंचा था। जिस कारण उसकी सारी अनुमतियां रद्द हो गई थी। इसके अलावा रेरा रजिस्ट्रेशन नियमों और जमीन रजिस्ट्री से संबंधित कई बिंदुओं को ईओडब्ल्यू ने जांच में अब तक शामिल ही नहीं किया है। इसलिए पूरी डील से लेकर ईओडब्ल्यू में दर्ज एफआईआर को शंकास्पद दृष्टि से देखा जा रहा है।

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